*नरवाई जलाना बंद करो*
अब तो वसुधा भी चीख उठी,
मत आग लगाओ खेतों में।
वर दो, हे माँ वीणापाणि!
सद्बुद्धि आए बेटों में ।।
क्या भूल गए कि ये वसुधा,
सारे जीवों की माता है ?
फिर अन्न प्राप्त हो जाने पर
मानव क्यों आग लगाता है ?
कितने ही सूक्ष्म जीव जंतु,
धरती पर सदा विचरते हैं ।
निर्दोष बिना कारण ही क्यों ?
नरवाई के सँग जलते हैं ।।
हैं विहग-वृंद के ठौर विटप,
जिनमें कई प्राणी हैं पलते।
तरु प्राणवायु देने वाले,
पावक की लपटों से जलते।
गौमाता अश्रु बहाती है,
यूँ कब तक इसे रुलाओगे ।
अब बंद करो ये काम बंधु!
कब तक नरवाई जलाओगे ।।
यह सृजन पंथ कितना दुष्कर,
पूछो ये भाग्य विधाता से।
कितना मुश्किल पालन पोषण,
पूछो इक शिशु की माता से ।।
गौ को माता कहते लेकिन,
क्या अपना फ़र्ज़ निभाते हो ?
हे बंधु! बताओ तो क्योंकर,
खेतों में आग लगाते हो ?
नरवाई मृत्तिका में मिलकर,
उत्कृष्ट खाद बन जाती है।
वसुधा का मन पुलकित होता,
फसलें हँसती-मुस्काती है।।
अब बनो सृजन के कर्णधार,
यूँ आग लगाना बंद करो।
हे बंधु मेरे! हे भाई मेरे!
नरवाई जलाना बंद करो...
हे बन्धु मेरे! हे भाई मेरे!
नरवाई जलाना बंद करो...
अब तो वसुधा भी चीख उठी,
मत आग लगाओ खेतों में।
वर दो, हे माँ वीणापाणि!
सद्बुद्धि आए बेटों में ।।
क्या भूल गए कि ये वसुधा,
सारे जीवों की माता है ?
फिर अन्न प्राप्त हो जाने पर
मानव क्यों आग लगाता है ?
कितने ही सूक्ष्म जीव जंतु,
धरती पर सदा विचरते हैं ।
निर्दोष बिना कारण ही क्यों ?
नरवाई के सँग जलते हैं ।।
हैं विहग-वृंद के ठौर विटप,
जिनमें कई प्राणी हैं पलते।
तरु प्राणवायु देने वाले,
पावक की लपटों से जलते।
गौमाता अश्रु बहाती है,
यूँ कब तक इसे रुलाओगे ।
अब बंद करो ये काम बंधु!
कब तक नरवाई जलाओगे ।।
यह सृजन पंथ कितना दुष्कर,
पूछो ये भाग्य विधाता से।
कितना मुश्किल पालन पोषण,
पूछो इक शिशु की माता से ।।
गौ को माता कहते लेकिन,
क्या अपना फ़र्ज़ निभाते हो ?
हे बंधु! बताओ तो क्योंकर,
खेतों में आग लगाते हो ?
नरवाई मृत्तिका में मिलकर,
उत्कृष्ट खाद बन जाती है।
वसुधा का मन पुलकित होता,
फसलें हँसती-मुस्काती है।।
अब बनो सृजन के कर्णधार,
यूँ आग लगाना बंद करो।
हे बंधु मेरे! हे भाई मेरे!
नरवाई जलाना बंद करो...
हे बन्धु मेरे! हे भाई मेरे!
नरवाई जलाना बंद करो...

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